भारतीय तटरक्षक का इतिहास
विस्तार से
1960 की समाप्ति के दौरान समुद्रपार से समुद्र में तस्करी नियंत्रित नहीं हो रही थी जिससे राष्ट्र की अर्थ व्यवस्था पर खतरा पैदा हो गया था । केन्द्रीय आबकारी तथा सीमाशुल्क बोर्ड के लिए नौसेना द्वारा संचालित 05 सीमाशुल्क गश्ती क्राफ्ट तस्करों को रोकने में पूर्णत: पर्याप्त नहीं थे । तत्काल उपायों के तौर पर तस्करी-रोधी प्रयासों को बढ़ाने के लिए 13 जब्त की गई ढ़ों को उनकी अंतर्निहित बाधाओं के बावजूद भी सेवा में लगाया गया ताकि विद्यमान बेड़े को मदद मिल सके । तथापि, यह पूरा बलस्तर भारी मात्रा में तस्करी की गतिविधियों को रोकने में केवल मामूली तौर पर ही प्रभावी था । समुद्र में तस्करी के आवागमन की समस्या की जांच में निम्नलिखित शामिल था:-
* बिना किसी प्रभावी क्षेत्रव्याप्ति के लम्बी तट रेखा ।
* तट के पास बड़ी मात्रा में मछली पकड़ने की गतिविधियों में अवैध आवाजाही की पहचान न कर पाना, विशेषकर जब मछुवाही क्राफ्टों/नौकाओं के पंजीकरण के लिए किसी प्रभावी पद्धति का लागू न होना ।
* अपने क्षेत्राधिकार के भीतर अवैध पोतों को पकड़ने की आवश्यकता ।
* तस्करों तथा प्रयोग में लाए जा रहे तीव्र गति के पोत (नाग चौधरी समिति की रिपोर्ट)
समुद्र में भारी मात्रा में हो रही तस्करी के कारण प्रधानमंत्री के 23 जनवरी 1970 के निर्देशों के अनुपालन में मंत्रिमंडल सचिवालय ने डा. बी डी नाग चौधरी की अध्यक्षता तथा वायुसेना अध्यक्ष ओ पी मेहता तथा एडमिरल आर डी कटारी, आई एन (सेवानिवृत्त) तथा दूसरे सदस्यों के साथ मामले को जांचने तथा रिपोर्ट देने के लिए एक अध्ययन दल का गठन किया ।
* अधिग्रहण के लिए क्राफ्टों की संख्या तथा किस्म ताकि तस्करी-रोधी कार्यों की तुरन्त रोकथाम की आवश्यकता को पूरा किया जा सके ।
* आपूर्ति के स्रोत तथा विश्व बाजार में उनकी उपलब्धता, ताकि संक्रियात्मक आवश्यकता से निपटा जा सके ।
* तस्करी-रोधी आपरेशनों के लिए होवरक्राफ्ट, हेलिकॉप्टर तथा दूसरे वायुयानों की उपयोगिता ।
नाग चौधरी ने अपनी रिपोर्ट, जोकि अगस्त 1971 में सौंपी गई, में सिफारिश की गई थी कि तस्करी-रोधी क्षमताओं को त्रिस्तरीय बनाने तथा तस्करी-रोधी उपायों के लिए स्वदेशी निर्माण तथा तलीय क्राफ्टों के शीघ्र अधिग्रहण की तुरन्त आवश्यकता है । तथापि, जब तक कि नये तीव्रगामी तलीय क्राफ्टों का अधिग्रहण नहीं होता । तीव्रगामी अंतर्रोधी नौकाएं ही हमारी सीमित तस्करी-रोधी क्षमता को तुरन्त बढ़ाने के लिए पहली पसंद थी । निगरानी क्राफ्टों का चरणबद्ध अधिग्रहण कार्यक्रम उसी प्रकार सुविधानुसार तेज किया जा सकेगा ।
03 मई 1973 को श्री वी सी शुक्ला, रक्षा उत्पादन मंत्री की अध्यक्षता में बैठक आयोजित हुई ताकि सीमाशुल्क विभाग के लिए उपयुक्त नौकाओं के अधिग्रहण में तेजी लाई जा सके । दो प्रकार के गश्ती पोतों की आवश्यकता महसूस की गई । 16 कर्मियों के लिए हल्के आयुध से लैस 1000 समुद्री मील रेंज के साथ अधिकतम 30 समुद्री मील गति के बड़े आकार की गश्ती नौका तथा 12 कर्मियों के लिए हल्के आयुध से लैस तीव्र गति की छोटी नौकाएं होंगी । अंतरा मंत्रिमंडलीय बैठक में(जिसमें रक्षा उत्पादन मंत्री तथा राजस्व तथा व्यय मंत्री दोनों ही मौजूद थे) यह निर्णय लिया गया कि नाग चौधरी समिति की सिफ़ारिशों के अनुपालन में मध्यम नौकाएं भी अधिग्रहीत की जानी चाहिए । 22 नवम्बर 1973 को रक्षा उत्पादन मंत्रालय के साथ अगली बैठक में सीमाशुल्क विभाग ने अपने लिए 20 परिवर्तित समुद्रगामी नौका मार्क -II की आवश्यकता जताई ।
तटरक्षक की आवश्यकता
पिछले कुछ समय से भारत में विभिन्न गैर-सैनिक समुद्री कार्यों के निष्पादन के लिए तटरक्षक की आवश्यकता विशेषकर नौसेना द्वारा महसूस की जा रही थी । तथापि, 31 अगस्त 1974 के बाद ही इस समस्या पर अधिकारिक तौर पर गंभीरता पूर्वक विचार किया गया जब रक्षा सचिव ने एक नोट मंत्रिमंडल सचिवालय को भेजा, जिसमें उन्होंने तटरक्षक के किस्म की किसी राष्ट्रीय संगठन के स्थापना का विवेचन किया । रक्षा सचिव के नोट का सार यही है कि हमारे समुद्री क्षेत्राधिकार में विधि प्रवर्तन के द्वारा जीवन एवं सम्पत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई भी संगठन हमारे आसपास के समुद्र में बढ़ती गतिविधियों का मुकाबला नहीं कर पाया । नोट में यह भी सुझाया गया कि कोई उपयुक्त अंतरामंत्रिमंडिलीय निकाय विद्यमान संगठनों की पर्याप्तता पर विचार करे और या तो किसी संगठन का विलय कर अथवा तटरक्षक जैसे केन्द्रीय संगठन की स्थापना करके उनकी गतिविधियों के बीच घनिष्ठ समन्वय की संभावनाएं तलाशे । इस संदर्भ में नौसेना अध्यक्ष ने भी समुद्र में वृहत्तर अंतरामंत्रिमंडलीय समन्वय के लिए जोर दिया ताकि अंतग्रहण उपायों के लिए दोहरे प्रयास न किए जायं । अत: एकीकृत पहल के साथ राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल किया जाए । यह भी महसूस किया गया कि प्रवर्तन का कार्य नौसेना द्वारा नहीं किया जायेगा, क्योंकि उन्हें अनिवार्य तौर से उनके संक्रियात्मक कार्यों से हटाना पड़ता है तथा उनके प्रशिक्षण में बाधा पड़ती है । आगे, विशिष्ट कार्यों के लिए प्रशिक्षित युद्धपोतों तथा जनशक्ति को शांतिकाल में विधि प्रवर्तन कार्यों में लगातार तैनात करना ना तो सोचा गया था, नाही लागत प्रभावी है ।
रूस्तमजी समिति
आंतरिक सुरक्षा अधिनियम अनुरक्षण जोकि तस्करी-रोधी तथा विदेशी मुद्रा उल्लंघन से संबंधित अपराधों के लिए निवारक रोक उपलब्ध कराता है, के संशोधन के तुरन्त बाद तस्करी को रोकने के लिए एक ठोस अभियान चलाया गया था । इस संदर्भ में सितम्बर 1974 में मंत्रिमंडलीय सचिव की अध्यक्षता में हमारे तस्करी-रोधी तथा दूसरी समुद्री गतिविधियों की कमियों की जांच करने तथा भारत के समुद्री संसाधनों की सुरक्षा करने और तटरक्षक के सृजन के लिए एक सचिवों की समिति नियुक्त की गई । समिति की अध्यक्षता श्री के एफ रूस्तमजी, विशेष सचिव, गृह मंत्रालय द्वारा की जानी थी । वाइस एडमिरल वी ए कामथ, पी वी एस एम उप नौसेनाध्यक्ष तथा श्री जसजीत सिंह , अध्यक्ष केन्द्रीय उत्पाद तथा सीमाशुल्क बोर्ड तथा अन्य समिति के सदस्य थे । रूस्तमजी समिति ने 31 जुलाई 1975 को भेजी गई अपनी रिपोर्ट में सामान्य अधीक्षण तथा शांतिकाल के दौरान हमारे समुद्री क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए तटरक्षक जैसे संगठन की स्थापना की कड़ी सिफारिश की । हमारे अपतटीय क्षेत्रों में तेल पाये जाने के कारण समिति के विचारों को और अधिक बल मिला । समिति ने यह भी सिफारिश की कि तटरक्षक सेवा नौसेना के ढर्रे पर आधारित तथा रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करे । रूस्तमजी समिति की सिफारिशों पर सचिवों द्वारा विचार किया गया और 07 जनवरी 1976 को उन्हें स्वीकार कर लिया गया । तथापि, समिति ने निर्णय लिया कि नये संगठन को गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करना चाहिए । बाद में, प्रधानमंत्री के स्तर पर निर्णय पर पुन: विचार किया गया और इसे रक्षा मंत्रालय के नियंत्रण में रखने का निर्णय लिया गया ।
मुख्य बातें – रक्षा मंत्रालय स्तर पर
रक्षा मंत्रालय ने राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति के विचारार्थ एक मामला तैयार किया जिसमें निम्नलिखित के लिए अनुमोदन मांगा गया:-
* तटरक्षक संगठन की स्थापना के लिए आवश्यक कदम उठाना ।
* रक्षा मंत्रालय में केन्द्रीय मुख्यालय के साथ वाइस एडमिरल रैंक का विशेष ड्यूटी अफसर नियुक्त करना तथा तटरक्षक संगठन के लिए विस्तृत परियोजना तैयार करने के लिए उचित स्टाफ उपलब्ध कराना ।
* नौसेना के दो पुराने फ्रिगेटों के साथ अंतरिम तटरक्षक बल का सृजन तथा गृह मंत्रालय से पाँच गश्ती पोतों का हस्तांतरण ।
* 07 जनवरी 1977 को मंत्रिमंडल ने नौसेना के भीतर एक अंतरिम तटरक्षक संगठन के प्रस्ताव को मंजूर किया ताकि विनिर्दिष्ट तटरक्षक कार्यों को किया जा सके । राजनीतिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति ने यह निर्देश दिया कि तटरक्षक को बजटीय प्रावधानों के लिए राजस्व तथा बैंकिंग विभाग के प्राक्कलन में अलग शीर्ष के तहत रखा जाना चाहिए । आगे, यह भी निर्देशित किया गया कि तटरक्षक के लिए विस्तृत योजना तैयार की जानी चाहिए ।
समुद्री क्षेत्र अधिनियम 1976
समुद्र तथा समुद्र तल से आर्थिक लाभ उठाने के प्रति जागरूकता बढ़ने से बहुत से
तटीय प्रान्तों ने अपने प्रान्त से लगे बड़े समुद्री क्षेत्र पर अपना क्षेत्राधिकार का दावा किया है । यू एन सी एल ओ एस की तीसरी बैठक में कमियों को सुलझाया गया तथा अंतर्राष्ट्रीय समुद्री तल क्षेत्र के लिए विधान विकसित किया गया । दुनिया के विद्यमान हालातों की बराबरी के लिए भारत सरकार ने 25 अगस्त 1976 को समुद्री क्षेत्र अधिनियम बनाया । यह अधिनियम 15 जनवरी 1977 को लागू हुआ, जिसमें 2.01 लाख वर्ग किलोमीटर के संपूर्ण अन्नय आर्थिक क्षेत्र के क्षेत्र को राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार में लाया गया । इतने बड़े समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा तथा राष्ट्रीय विधियों का प्रवर्तन और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना एक भारी काम था, जिसके लिए एक समर्पित संगठन की आवश्यकता होगी ।
अंतरिम तटरक्षक संगठन

01 फरवरी 1977 को गठित अंतरिम तटरक्षक प्रकोष्ठ, आसीन (बाये से दांये) ले. कमांडर दत्त, कमोडोर सारथी वाइस एडमिरल वी ए कॉमथ, कमांडर भनोट, श्री वरदान खड़े हुए (बांये से दांये) श्री संधू, श्री जैन, श्री पिल्लै, श्री मल्होत्रा, श्री शास्त्री
07 जनवरी 1977 को मंत्रीमंडल के निर्णय का अनुसमर्थन करते हुए 01 फरवरी 1977 को नौसेना मुख्यालय के अंतर्गत अंतरिम तटरक्षक संगठन की स्थापना हुई । आरम्भ में नौसेना से निकाले गये दो फ्रिगेट (भारतीय नौसेना पोत कृपाण तथा कुठार) तथा गृह मंत्रालय से स्थानांतरित पाँच गश्ती नौकाओं (पम्बन, पुरी, पुलीकैट, पणजी तथा पनवेल) को शामिल किया गया । इनको तटवर्ती क्षेत्र तथा द्वीप क्षेत्रों में तटरक्षक ड्यूटियों का निर्वाह करने के लिए तैनात किया गया । इसका उद्देश्य हमारे समुद्री क्षेत्र में निगरानी बनाये रखना तथा सीमित बल के साथ हमारे समुद्री क्षेत्रों में समुद्री गतिविधियों को मूल्यांकित करना था ।
कामथ योजना
तटरक्षक सेवा के लिए समग्र योजना, विशेष ड्यूटी अफसर (ओ एस डी) वाइस एडमिरल वी ए कामथ द्वारा तैयार की गयी जिसमें शर्त के संदर्भ के रूप में तीन भाग अपेक्षित थे तथा 05 जुलाई 1978 को राजनैतिक कार्य की मंत्रीमंडल समिति (सी सी पी ए) को अनुमोदन के लिए प्रस्तुत किया गया । योजना निम्नवत थी:-
1. भाग-I में मुख्य योजना थी जिसे भाग-II, जिसमें निम्नलिखित शामिल थे, के विस्तृत परिशिष्टों द्वारा अनुसमर्थन था:-
* भारत में विभिन्न समुद्री एजेन्सियों का अध्ययन तथा ऐसी गतिविधियों, जोकि प्रयास के अनुलिपि के परिहार करने तथा एक समाकलन दृष्टिकोण को सुनिश्चित करने को अंतर्ग्रथन करती हों, की पहचान करना ।
* तटरक्षक के लिए भूमिका निर्धारण तथा संगठन ।
* सेवा के निबंधन एवं शर्ते ।
* नयी सेवा की स्थापना के विधिक पहलू ।
* उन क्षेत्रों की पहचान करना जिनमें तटरक्षक भारतीय नौसेना तथा अन्य केन्द्रीय सरकारी एजेन्सियों पर निर्भर है ।
* बजट ।
2. भाग-III के अंतर्गत तटरक्षक के लिए विकास योजना 1978-84 अवधि के लिए एक छह वर्षीय-योजना का निपटारा किया जाएगा ।

भारतीय तटरक्षक (1978) का उद्घाटन करने के दौरान प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई सम्मान गारद का निरीक्षण करते हुए

नौसेना डॉकयार्ड, मुम्बई (1978) में उद्घाटन समारोह के उपरांत प्रधानमंत्री के साथ वाइस एडमिरल वी ए कॉमथ ।
तटरक्षक अघिनियम – 1978
प्रक्रिया, जोकि लगभग एक दशक से शुरू हो चुकी थी, 18 अगस्त 1978 को संसद में अधिनियम पारित होने के द्वारा तटरक्षक सेवा के निर्माण का रूप ले सकी तथा वह 19 अगस्त 1978 को लागू हुआ ।
‘एक ऐसा अधिनियम, जोकि सामुद्रिक तथा समुद्री क्षेत्रों में अन्य राष्ट्रीय हितों तथा संबद्ध मामलों के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए भारत के समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा को सुनश्चित करने के लिए, संघ के एक सशस्त्र बल का गठन एवं विनियमन करें ।’
कर्तव्य तथा कृत्य
1. तटरक्षक का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे उपायों द्वारा जो वह उचित समझे, भारत के सामुद्रिक क्षेत्र में भारत के सामुद्रिक तथा अन्य राष्ट्रीय हितों की संरक्षा करें ।
2. उपधारा (क) के उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उसमें निर्दिष्ट उपायों में निम्नलिखित के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्:-
* किसी सामुद्रिक क्षेत्र में कृत्रिम द्वीपों, समुद्र में तट से दूर टर्मिनलों, संस्थापनों तथा अन्य संरचनाओं और युक्तियों की सुरक्षा और संरक्षण को सुनिश्चित करना ।
* मछुवारों को संरक्षण देना, जिसके अंतर्गत समुद्र में, जब वे संकट में हों, उनकी सहायता करना भी है ।
* ऐसे उपाय करना जो सामुद्रिक पर्यावरण को परिरक्षित और सुरक्षित रखने तथा सामुद्रिक प्रदूषण को रोकने एवं नियंत्रित करने के लिए आवश्यक हैं ।
* तस्करी विरोधी संक्रियाओं में सीमा-शुल्क तथा अन्य अधिनियमितियों के उपबंधों को प्रवर्तित करना जो इस समय सामुद्रिक क्षेत्र में प्रवृत्त हैं, तथा
* ऐसी अन्य बातें, जिनके अंतर्गत समुद्र में जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के उपाय तथा वैज्ञानिक आंकड़े एकत्रित करना भी हैं, जो विहित की जाएं ।
3. तटरक्षक इस धारा के अधीन अपने कृत्यों का पालन ऐसे नियमों के अनुसार और उनके अधीन रहते हुए करेगा जो विहित किए जाएं और ऐसे नियमों में, विशेषकर यह सुनिश्चित करने के लिए, उपबंध हो सकेंगे कि तटरक्षक संघ के अभिकरणों, संस्थानों तथा प्राधिकारियों के निकट संपर्क में इस प्रकार कार्य कर सके कि प्रयत्नों की पुनरावृत्ति न हो ।